चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को प्रारम्भ में एक वैश्विक आर्थिक एवं संपर्क परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिसका उद्देश्य एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच व्यापारिक तथा अवसंरचनात्मक संपर्क को सुदृढ़ करना था, किंतु समकालीन परिप्रेक्ष्य में इसका स्वरूप मात्र आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहा है। यह पहल अब चीन की व्यापक भू-आर्थिक, भू-राजनीतिक तथा सामरिक रणनीति का प्रमुख उपकरण बन चुकी है, जो उसकी ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव के साथ मिलकर दक्षिण एशिया के पारंपरिक शक्ति-संतुलन को प्रभावित कर रही है। इस परिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव भारत पर पड़ता है, क्योंकि दक्षिण एशिया ऐतिहासिक रूप से उसके राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव का प्रमुख क्षेत्र रहा है। पाकिस्तान, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल तथा भूटान में चीन की बढ़ती आर्थिक और अवसंरचनात्मक उपस्थिति ने क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा प्रदान की है। ग्वादर, हंबनटोटा तथा अन्य सामरिक परियोजनाएँ चीन की तथाकथित “मोतियों की माला” रणनीति को प्रतिबिंबित करती हैं, जिसके माध्यम से वह हिंद महासागर क्षेत्र में अपना प्रभाव विस्तार कर रहा है तथापि, यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि चीन के उदय ने भारत की क्षेत्रीय भूमिका को पूर्णतः प्रतिस्थापित कर दिया है। भारत ने ‘पड़ोस प्रथम’ तथा ‘सागर’ जैसी नीतियों, सांस्कृतिक निकटता, विकास सहयोग और बहुआयामी कूटनीतिक पहलों के माध्यम से अपनी क्षेत्रीय उपस्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। यह अध्ययन दर्शाता है कि बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को केवल आर्थिक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि उसके सामरिक, राजनीतिक, कूटनीतिक और विकासात्मक आयामों के समेकित संदर्भ में समझना आवश्यक है, क्योंकि भविष्य में दक्षिण एशिया की शक्ति-राजनीति और क्षेत्रीय व्यवस्था पर इन प्रक्रियाओं का गहरा प्रभाव पड़ने वाला है।
नए सिल्क रोड, यूरेशियाई कनेक्टिविटी, आर्थिक गलियारा, सैटेलाइट स्टेट, बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI), दक्षिण एशिया.
1. पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्टेट काउंसिल (मार्च 2026) चीन के राष्ट्रीय आर्थिक एवं सामाजिक विकास हेतु 15वीं पंचवर्षीय योजना (2026-2030) की रूपरेखा. फॉरेन लैंग्वेजेज प्रेस, बीजिंग, अध्याय 23, पृ. 12-19।
प्रस्तुत शोध अध्ययन में महासमुंद जिले के उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययनरत् 14 से 17 वर्ष के 140 विद्यार्थियों (70 अंग्रेजी माध्यम एवं 70 हिन्दी माध्यम) पर आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य शेैक्षणिक उपलब्धि अभिर्प्रेरणा का तुलनात्मक अध्ययन करना था। शोधकर्त्ता ने सर्वेक्षण विधि का उपयोग करते हुए डॉ. टी. आर. शर्मा द्वारा निर्मित प्रमाणित प्रश्नावली के माध्यम से प्रदत्तों का संकलन किया और सांख्यिकीय विश्लेषण हेेतु मध्यमान, प्रमानिक विचलन तथा क्रांतिक अनुपात सी. आर. का प्रयोग किया। शोध के परिणामों से स्पष्ट हुआ कि अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों ने लिंग केे आधार पर शैक्षणिक उपलब्धि अभिप्रेरणा में सार्थक अंतर पाया गया। (जहां छात्राओं का मध्यमान 28.05 और छात्रों का 24.74 रहा) जबकि हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों की तुलना में कोई सार्थक अंतर दृष्टिगोचर नहीं हुआ। अंततः यह निष्कर्ष निकलता है कि शैक्षणिक उपलब्धि अभिप्रेरणा में शिक्षा का माध्यम एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं, तथा इस अध्ययन के परिणाम शैेक्षिक जगत में समस्याओं के निवारण और अवलोकन प्रणाली के विकास में सहायक हो सकते है।
उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, विद्यार्थी, अंग्रेजी एवं हिन्दी माध्यम.
1. धन्दा, विमला व चिकारा, सुधा (1998) गृह विज्ञान के विद्यार्थियों ने आत्य संकल्पना का शैक्षिक स्तर व उपलब्धि के मध्य संबंध का अध्ययन किया, फोर्थ सर्वे ऑफ रिसर्च इन एजुकेशन, एनसीईआरटी, नई दिल्ली, वाल्युम-1, पृ. 812।
सुकमा जिले की मुरिया जनजाति कृषि कार्य में विभिन्न फसलों की खेती करते हैं जैसेः धान, मक्का, कोदो, कुटकी, रागी, बाजरा, ज्वार, मुंग, बरबट्टी, कुलथी, उड़द, तिलहन, सूरजमुखी और विभिन्न सब्जियाँ है। पूर्व में यह जनजाति स्थानांतरित कृषि करते थे और वे लंबे समय तक परंपरागत कृषि में भी संलग्न रहे जो कि जीवन निर्वाह तक ही सीमित रही जिससे इनकी अर्थव्यवस्था निम्न स्तर पर थी। आधुनिक समाजों से दूरी और शिक्षा का अभाव होने के कारण वे लंबे समय तक परंपरागत कृषि से जुडे़ रहे है। वर्तमान में इन्होंने शिक्षा ग्रहण किया और आधुनिक समाजों से जुड़े इस तरह इनके जीवन में धीमी गति से बदलाव आया जिससे आज यह अपने पारंपरिक ज्ञान के साथ ही आधुनिक यंत्रो का प्रयोग कर अपनी अर्थव्यवस्था में काफी सुधार किए हैं। राज्य शासन की योजनाओं तथा नए यंत्रो से कृषि क्षेत्र में लाभ अर्जित कर रहें हैं जिससे इनके फसलों की उपजता अच्छी हो रही है। मुरिया जनजाति अपने कृषि कार्य में धार्मिक अनुष्ठानिक क्रियाओं को करते हैं। यह जनजाति कृषि क्षेत्र में उन्नति और समस्याओं से बचाव के लिए देवी-देवताओं की सेवा कर उन्हें प्रसन्न करने में विश्वास रखते हैं। यह पारंपरिक ज्ञान जिनका लिखित अभाव है जिसे मौखिक रूप से आगे बढ़ाया जाता है। मुरिया जनजाति में कृषि पद्धति का पारंपरिक ज्ञान जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती है वह ज्ञान कृषि कार्य हेतु आज भी प्रचलन में है।
छत्तीसगढ़, बस्तर, सुकमा, मुरिया जनजाति, कृषि पद्धति, परंपरागत ज्ञान.
1. Doshi, S.L. & Jain, P.C. (2001) Social Anthropology. Rawat Publication, Jaipur. p. 360-361
Samuel Taylor Coleridge’s The Rime of the Ancient Mariner is traditionally celebrated as a masterpiece of British Romanticism, capturing the terrifying power of the supernatural. Yet the text’s complex publication history makes understanding the poem far more complicated than a surface level reading suggests. Nearly two decades after its initial 1798 publication, Coleridge added a prose marginal gloss to the 1817 edition. Traditional scholarships often treat this gloss as a helpful guide. But a closer analysis reveals something entirely different. The gloss actually functions as an unreliable, actively competing voice. By examining the poem’s structure, narrative style, and physical layout, the evidence shows that the 1817 gloss acts as an anxious, logic driven overlay. It tries to control the wild ambiguity of the original poetic voice, questioning the possibility of a single objective interpretation.
S.T. Coleridge, Marginal Gloss, Paratext, Romanticism, Textual Ambiguity, Interpretation.
1. Coleridge, Samuel Taylor (2007) The Rime of the Ancient Mariner. Lyrical Ballads, with a Few Other Poems, edited by Michael Mason, Pearson Longman, Harlow, UK.
पश्चिमी हिंदी की प्रमुख बोली खड़ी बोली है। इसे हिंदी, कौरवी आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। ‘खड़ी‘ नाम के संबंध में कई मत व्यक्त किये गये है परंतु अर्थ और व्युत्पत्ति के आधार पर विद्वानों ने दो वर्ग में अपने-अपने विचार एवं मत प्रस्तुत किये हैं, लेकिन खड़ी बोली की प्राचीन परम्परा हमें विरासत में मिली है। वास्तव में मुसलमानों के शासन काल से ही खड़ी बोली का प्रयोग प्रशासनिक और व्यवहार की भाषा के रूप में आरंभ हो गया था। खड़ी बोली से आए आशय यह है कि साधारण रूप से जब हम बोली के अर्थ को ‘खड़ी‘ शब्द में प्रयोग उपयोग करते हैं तो उसके अंतर्गत संसार की सभी वर्तमान भाषाएँ खड़ी बोली कही जा सकती है, क्योंकि भारत एक ऐसा देश है जहाँ विविधता में एकता दिखाई देती है अर्थात् यहां पर अनेक जाति, धर्म एवं समुदाय के लोग निवास करते हैं और अपनी भाषा, संस्कृति खान-पान एवं रीति-रिवाज के प्रति उदारता सौंदर्य और जीवन्तता की सुखद अनुभूति प्राप्त करते हैं।
खड़ी बोली प्राचीन परम्परा, व्युत्पत्ति, प्रशासनिक समुदाय, संस्कृति.
1. शकल, जयन्त (1999) हिंदी गद्य भाषा का विकास (भारतेन्दु युगीन पत्रकारिता के संदर्भ में). कला प्रकाशन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, पृ. 36 से 38।
प्राचीन काल से ही जब सभ्यता की शुरुआत हुई तब से ही शिक्षा भारतीय समाज की बुनियादी आधार रहीं है। भारत के औपनिवेशीकरण से पहले अनौपचारिक ढाँचे वाली गुरुकुल शिक्षा प्रणाली प्रचलित थी। इस प्रणाली के अंतर्गत समाज से संवाद एवं ज्ञान और इसके उपयोग के बीच संबंध की ज्यादा संभावना थी। भारत में उच्चतर शिक्षा नालंदा और तक्षशिला के समय में ज्यादा समग्र और समाज से जुड़ी हुई थी। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश कालीन शिक्षा प्रणाली पर आधारित है क्यंोंकि ब्रिटिश शिक्षा, प्रणाली का ढाँचा औपचारिक था और भारतीय शिक्षा के विकास में इसका बहुमूल्य योगदान है। विश्वविद्याल, महाविद्यालय और विद्यालय स्तर पर शिक्षा के ढांचे का निर्माण एवं विकास भारत में इसी प्रणाली के अनुसार हुआ है।
शिक्षा, बुनियादी औपचारिक, अनौपचारिक, गुरुकुल, समुदाय, समाज. विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और विद्यालय.
1. कुलश्रेष्ठ, कमल (2022) राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (विशेषांक). योजना, मासिक पत्रिका, फरवरी 2022, वर्ष - 66 अंक - 2 पृ. 35-37।
डिजिटल प्रौद्योगिकी के अभूतपूर्व विस्तार ने जहाँ मानवीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को सुगम बनाया है, वहीं उसने अपराध के नवीन एवं जटिल स्वरूपों को भी जन्म दिया है। साइबर अपराध उनमें सर्वाधिक चिंताजनक है क्योंकि यह भौगोलिक सीमाओं, आयु की बाधाओं और सामाजिक स्तरों से परे सबको प्रभावित करता है। प्रस्तुत शोधपत्र इस परिघटना का समाजशास्त्रीय एवं अंतर्विषयक दृष्टिकोण से विश्लेषण करता है। यह अध्ययन यह तर्क प्रस्तुत करता है कि साइबर अपराध की उत्पत्ति और प्रसार के लिए केवल तकनीकी कमियाँ उत्तरदायी नहीं है। इसके गहरे सामाजिक-आर्थिक मूल हैं जिनमें डिजिटल विभाजन, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी एवं सांस्कृतिक रूपांतरण सम्मिलित हैं। मर्टन के विसंगति-सिद्धांत और सदरलैंड के विभेदक संगति-सिद्धांत के आलोक में यह शोधपत्र साइबर अपराध को एक ‘‘डिजिटल सामाजिक विकृति‘‘ के रूप में परिभाषित करता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, CERT-In एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के आँकड़ों के आधार पर यह अध्ययन पीड़ितों के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक अनुभव, कानूनी ढाँचे की सीमाओं तथा समाज-केन्द्रित निवारण उपायों की विस्तार से विवेचना करता है।
साइबर अपराध, सामाजिक विसंगति, विभेदक संगति, साइबर उत्पीड़न, डिजिटल साक्षरता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम.
1. Chawki, M. & Al-Dosari, B. (Eds.) (2020) Cybercrime in the 21st Century: Issues and Perspectives. Cham, Springer Nature Switzerland AG, Gewerbestrasse 11, 6330 Cham, Switzerland.
यह शोध पत्र छत्तीसगढ़ विधानवभा द्वारा हाल ही में पारित ‘‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026’’ का एक गहन कानूनी और संवैधानिक विश्लेषण है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य जबरन, कपटपूर्वक या प्रलोभन के माध्यम से होने वाले धर्मान्तरण को रोकना है। हालांकि, यह कानून भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतन्त्रता और अनुच्छेद 29) अल्पसंख्यकों के हित, के साथ, एक जटिल द्वंद् पैदा करता है। यह शोध पत्र कानून के कड़े प्रावधानों, जैसे आजीवन कारावास और ‘‘पूर्व घोषणा’’ की अनिवार्यता की समीक्षा करता है तथा मुख्य ध्यान इस बात पर है कि क्या यह अधिनियम अनुच्छेद 25 (अन्तःकरण की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यक हितों का संरक्षण) के साथ सामंजस्य बिठाता है या उनका उल्लंघन करता है।
धर्म स्वातंत्र्य, अल्पसंख्यक, अनुच्छेद 25-30.
The growing adoption of electric vehicles has transformed the transportation sector worldwide. Among various electric mobility solutions, electric scooters have gained significant popularity due to their affordability, environmental benefits, and suitability for urban commuting. However, consumer adoption remains influenced by several factors, particularly purchase price, driving range, and charging infrastructure availability. This study investigates the impact of these factors on consumer purchase decisions regarding electric scooters. Primary data were collected through a structured questionnaire from 62 respondents using a five-point Likert scale. The study employed descriptive and analytical research methods to examine consumer perceptions. The findings indicate that charging infrastructure and driving range positively influence purchase decisions, while price sensitivity remains a significant concern among consumers. The study contributes to the growing literature on electric vehicle adoption and provides valuable insights for policymakers, manufacturers, and marketers seeking to accelerate the transition toward sustainable transportation.
Electric Scooters, Consumer Purchase Decision, Electric Vehicles, Driving Range, Charging Infrastructure, Price Sensitivity.
1. Ajzen, I. (1991) The theory of planned behavior. Organizational Behavior and Human Decision Processes, 50(2), 179–211.
Sunflower seeds (Helianthus annuus L.) have emerged as an important source of nutritionally and pharmacologically valuable bioactive compounds with expanding relevance in preventive healthcare, nutraceutical development, and functional food industries. Owing to their rich phytochemical composition, sunflower seeds possess considerable therapeutic potential supported by both traditional medicinal practices and modern pharmacological investigations. The present review critically examines the phytochemical constituents, nutritional profile, traditional medicinal relevance, and therapeutic applications of sunflower seeds with emphasis on their biological and industrial significance. Sunflower seeds are characterized by the presence of proteins, polyunsaturated fatty acids, dietary fiber, tocopherols, phenolic acids, flavonoids, phytosterols, selenium, magnesium, and other micronutrients that collectively contribute to antioxidant, anti-inflammatory, cardioprotective, antimicrobial, and antidiabetic activities. Among these constituents, linoleic acid and alpha-tocopherol play a crucial role in reducing oxidative stress, regulating inflammatory responses, and maintaining cardiovascular stability. Traditional medicinal systems have historically utilized sunflower seeds and sunflower oil for digestive support, skin nourishment, wound healing, enhancement of vitality, and immune regulation. Recent scientific investigations have validated several ethnomedicinal claims through phytochemical and pharmacological studies demonstrating the multifunctional therapeutic efficacy of sunflower-derived compounds. In addition, the increasing global demand for plant-based nutrition and natural therapeutic agents has expanded the industrial applications of sunflower seeds in pharmaceutical, cosmetic, nutraceutical, and food-processing sectors. This review highlights the medicinal relevance, phytochemical diversity, and emerging healthcare applications of sunflower seeds while emphasizing their growing significance in sustainable nutrition and evidence-based herbal medicine.
Helianthus Annuus, Sunflower Seeds, Phytochemical Profiling, Bioactive Compounds, Traditional Therapeutics, Antioxidant Activity.
1. Hussain, M.; et al. (2018) Drought stress in sunflower: Physiological effects and its management. Agricultural Water Management, vol. 201, p. 152–166, 2018.